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भीष्म पर्व
अध्याय ७९
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सञ्जय़ उवाच
स च्छाद्यमानो वहुभिः शरैः संनतपर्वभिः |  ४८   क
स्वस्रीय़ाभ्यां नरव्याघ्रो नाकम्पत यथाचलः |  ४८   ख
प्रहसन्निव तां चापि शरवृष्टिं जघान ह ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति