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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निचक्रोपमं घोरं विकर्षन्परमाय़ुधम् |  ३४   क
व्यशातय़च्छरांस्तांस्तु द्रोणः समितिशोभनः |  ३४   ख
महानभूत्ततः शव्दो वंशानामिव दह्यताम् ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति