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द्रोण पर्व
अध्याय ७९
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सञ्जय़ उवाच
शव्दस्तु देवदत्तस्य धनञ्जय़समीरितः |  १२   क
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैव समावृणोत् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति