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द्रोण पर्व
अध्याय ७९
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सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा धनुरन्यत्तु शल्यो विव्याध पाण्डवम् |  २५   क
भूरिश्रवास्त्रिभिर्वाणैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति