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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रय़न्त्रकवचान्मुक्तकेशान्कृताञ्जलीन् |  १०१   क
वेपमानान्क्षितौ भीतान्नैव कांश्चिदमुञ्चताम् ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति