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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
कांश्चिदापततो वीरानपरांश्च प्रधावतः |  १०५   क
व्ययोजय़त खड्गेन प्राणैर्द्विजवरो नरान् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति