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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
ते तु कृत्वा महत्कर्म श्रान्ताश्च वलवद्रणे |  ११   क
प्रसुप्ता वै सुविश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति