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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
मातॄरन्ये पितॄनन्ये भ्रातॄनन्ये विचुक्रुशुः |  ११५   क
केचिदूचुर्न तत्क्रुद्धैर्धार्तराष्ट्रैः कृतं रणे ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति