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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
न देवासुरगन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः |  ११७   क
शक्यो विजेतुं कौन्तेय़ो गोप्ता यस्य जनार्दनः ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति