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भीष्म पर्व
अध्याय १०५
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सञ्जय़ उवाच
अनीकमध्ये तिष्ठन्तं गाङ्गेय़ं भरतर्षभ |  २९   क
आशीविषमिव क्रुद्धं पाण्डवाः पर्यवारय़न् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति