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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
संवेष्टमानानुद्विग्नान्निरुत्साहान्सहस्रशः |  १२२   क
न्यपातय़न्नरान्क्रुद्धः पशून्पशुपतिर्यथा ||  १२२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति