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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
तावप्याचख्यतुस्तस्मै प्रिय़ं प्रिय़करौ तदा |  १४१   क
पाञ्चालान्सृञ्जय़ांश्चैव विनिकृत्तान्सहस्रशः |  १४१   ख
प्रीत्या चोच्चैरुदक्रोशंस्तथैवास्फोटय़ंस्तलान् ||  १४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति