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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
तमाक्रम्य तदा राजन्कण्ठे चोरसि चोभय़ोः |  १८   क
नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारय़त् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति