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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वय़म् |  ३०   क
हत्वा पाञ्चालराजं यो रथमारुह्य तिष्ठति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति