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कर्ण पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा रणे निहतः सूतपुत्रः; कच्चिच्छेते भूमितले दुरात्मा |  ३२   क
कच्चित्प्रिय़ं मे परमं त्वय़ाद्य; कृतं रणे सूतपुत्रं निहत्य ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति