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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च नदीश्चैव वनानि विविधानि च |  ३   क
अतिक्रम्य ससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति