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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान् |  ५३   क
दोर्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन वक्षस्येनमताडय़त् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति