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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
श्रुतकर्मा तु परिघं गृहीत्वा समताडय़त् |  ५५   क
अभिद्रुत्य ततो द्रौणिं सव्ये स फलके भृशम् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति