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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः |  ५८   क
सकुण्डलं शिरः काय़ाद्भ्राजमानमपाहरत् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति