द्रोण पर्व  अध्याय १६९

सञ्जय़ उवाच

क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् |  २२   क
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽय़मिति मन्यते ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति