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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
ददृशुः कालरात्रिं ते स्मय़मानामवस्थिताम् |  ६५   क
नराश्वकुञ्जरान्पाशैर्वद्ध्वा घोरैः प्रतस्थुषीम् |  ६५   ख
हरन्तीं विविधान्प्रेतान्पाशवद्धान्विमूर्धजान् ||  ६५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति