सौप्तिक पर्व  अध्याय ८

सञ्जय़ उवाच

तथा स शिविरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मदः |  ८१   क
व्यक्षोभय़त राजेन्द्र महाह्रदमिव द्विपः ||  ८१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति