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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता |  ४   क
कौन्तेय़ं समनुज्ञातुमिय़ेष भरतर्षभ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति