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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः |  ९४   क
जघ्नुः स्वानेव तत्राथ कालेनाभिप्रचोदिताः ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति