शान्ति पर्व  अध्याय २३७

व्यास उवाच

यस्मिन्वाचः प्रविशन्ति कूपे प्राप्ताः शिला इव |  ८   क
न वक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत् ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति