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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते |  ६१   क
प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्तीह केचन ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति