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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं वदतस्तस्य जटी वीटामुखः कृशः |  १७   क
दिग्वासा मलदिग्धाङ्गो वनरेणुसमुक्षितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति