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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
मृतो ह्ययमतो दृष्टः कथं जीवितमाप्तवान् |  १५   क
किमेतत्तपसो वीर्यं येनाय़ं जीवितः पुनः |  १५   ख
श्रोतुमिच्छाम विप्रर्षे यदि श्रोतव्यमित्युत ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति