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शान्ति पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः सम्भृतेभ्यस्ततस्ततः |  १६   क
क्रिय़ाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति