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शान्ति पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमास्थाय़ जीवतः |  ७   क
सन्त्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽय़ं किं वदिष्यति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति