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वन पर्व
अध्याय २८८
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वैशम्पाय़न उवाच
तथेति व्राह्मणेनोक्ते स राजा प्रीतमानसः |  १६   क
हंसचन्द्रांशुसङ्काशं गृहमस्य न्यवेदय़त् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति