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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
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संवर्त उवाच
प्रणम्य शिरसा देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् |  ३०   क
शरण्यं शरणं याहि महादेवं चतुर्मुखम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति