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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
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संवर्त उवाच
नोष्णं न शिशिरं तत्र न वाय़ुर्न च भास्करः |  ९   क
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्न भय़ं नृप ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति