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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रसंस्थं च विपुलं राज्यं विप्रोषिते त्वय़ि |  १५   क
त्रय़ोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति