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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
उत शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |  ६७   क
कल्माषपादः सरसि निमज्जन्राक्षसोऽव्रवीत् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति