अनुशासन पर्व  अध्याय ४७

भीष्म उवाच

क्षत्रिय़ो हि स्वधर्मेण श्रिय़ं प्राप्नोति भूय़सीम् |  ४१   क
राजा दण्डधरो राजन्रक्षा नान्यत्र क्षत्रिय़ात् ||  ४१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति