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मौसल पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः |  ४७   क
अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्त्रहारिणः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति