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द्रोण पर्व
अध्याय ३८
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु सङ्क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः |  २८   क
अय़ोधय़त सौभद्रमभिमन्युश्च तं रणे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति