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वन पर्व
अध्याय ४७
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जनमेजय़ उवाच
किमासीत्पाण्डुपुत्राणां वने भोजनमुच्यताम् |  ३   क
वानेय़मथ वा कृष्टमेतदाख्यातु मे भवान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति