सभा पर्व  अध्याय ८

नारद उवाच

कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान्हव्यवाहनः |  २८   क
नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणाय़नमृत्यवः ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति