वन पर्व  अध्याय ८

वैशम्पाय़न उवाच

तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय़ कृष्णद्वैपाय़नस्तदा |  २२   क
आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति