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विराट पर्व
अध्याय ८
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द्रौपद्यु उवाच
केशाञ्जानाम्यहं कर्तुं पिंषे साधु विलेपनम् |  १६   क
ग्रथय़िष्ये विचित्राश्च स्रजः परमशोभनाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति