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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
ततो गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रमर्धचन्द्रं सुतेजनम् |  ४६   क
स वेगय़ुक्तं चिक्षेप कर्णपुत्रस्य संय़ुगे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति