द्रोण पर्व  अध्याय ८

धृतराष्ट्र उवाच

दिवि शक्रमिव श्रेष्ठं महामात्रं धनुर्भृताम् |  २२   क
के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथाः ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति