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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
स सर्वतः प्रेक्ष्य दिशो विशून्या; भय़ावदीर्णैः कुरुभिर्विहीनः |  ४५   क
न विव्यथे भारत तत्र कर्णः; प्रतीपमेवार्जुनमभ्यधावत् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति