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आदि पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन वर्मभृत् |  ४   क
जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति