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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
एवङ्गते न हीदानीं वैद्यैः कार्यमिहास्ति मे |  ५३   क
क्षत्रधर्मप्रशस्तां हि प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति