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कर्ण पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः |  २८   क
प्रगृह्य चैव धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति