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शल्य पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
वाजिनां खुरशव्देन रथनेमिस्वनेन च |  १४   क
पत्तीनां चापि शव्देन नागानां वृंहितेन च ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति