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शल्य पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
ते गजा घनसङ्काशाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः |  २७   क
वज्ररुग्णा इव वभुः पर्वता युगसङ्क्षय़े ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति